कह दो उस हैवानियत से आज भी ज़िंदा हूँ मैं
जो भी नंगे हैं उन्हें आँचल से ढकता जाऊंगा
आसमां की गोद से छीना जिसे इंसान ने
परकटे उन पंछियों के दर्द को सहलाऊंगा !
है हवस बस नोचने की ताक में बैठा हुआ
उनके कानों में तो माँ की लोरियाँ चिल्लाऊंगा
है चमन जिनसे वे अब तो हो रहें बे-आबरू
ख़ुश्क होती सभ्यता के गीत कैसे गाऊँगा !
आज सन्नाटे भी चीखेँ अनसुनी है कर रही
ऐसी गफलत है कि बस ग़मख़्वार हीं रह जाऊंगा!
ख़ुश्क= सूखा, निर्जल, मुर्झाया हुआ
गम़ख्व़ार= दिलासा देते हुए
ग़़फलत= ऊंघ, अचेतनता
जो भी नंगे हैं उन्हें आँचल से ढकता जाऊंगा
आसमां की गोद से छीना जिसे इंसान ने
परकटे उन पंछियों के दर्द को सहलाऊंगा !
है हवस बस नोचने की ताक में बैठा हुआ
उनके कानों में तो माँ की लोरियाँ चिल्लाऊंगा
है चमन जिनसे वे अब तो हो रहें बे-आबरू
ख़ुश्क होती सभ्यता के गीत कैसे गाऊँगा !
आज सन्नाटे भी चीखेँ अनसुनी है कर रही
ऐसी गफलत है कि बस ग़मख़्वार हीं रह जाऊंगा!
ख़ुश्क= सूखा, निर्जल, मुर्झाया हुआ
गम़ख्व़ार= दिलासा देते हुए
ग़़फलत= ऊंघ, अचेतनता
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